देवरिया 04 सितंबर।
मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. ए.के. वैश्य ने बताया कि जनपद के सीमावर्ती राज्य बिहार में लंपी स्किन डिजीज (एल.एस.डी.) का संक्रमण पाया गया है, जिसके कारण गोवंशीय पशु प्रभावित हो रहे हैं। यह एक विषाणुजनित रोग है जो मच्छर, मक्खी, किलनी आदि वाहकों के माध्यम से एक पशु से दूसरे पशु में तेजी से फैलता है।
उन्होंने बताया कि इस बीमारी से ग्रसित पशुओं को तेज बुखार आता है, पूरे शरीर पर गांठें (नोड्यूल) बन जाती हैं, पशु खाना-पीना छोड़ देता है और धीरे-धीरे कमजोर हो जाता है। गर्भित पशुओं में गर्भपात की संभावना रहती है तथा चमड़े पर बनी गांठों में मवाद भी पड़ सकता है। ऐसे पशुओं को तुरंत स्वस्थ पशुओं से अलग रखना चाहिए और इसकी सूचना नजदीकी पशु चिकित्सालय या संबंधित पशु चिकित्सा अधिकारी को तत्काल देनी चाहिए।
मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी ने पशुपालकों से अपील की कि प्रभावित क्षेत्रों में कीटनाशकों का छिड़काव करें, मच्छरदानी का उपयोग करें और पशुशालाओं में स्वच्छता बनाए रखें। प्रभावित पशुओं को स्वच्छ पानी पिलाया जाए तथा उनका दूध उबालकर ही प्रयोग में लाया जाए। बीमार पशुओं की देखभाल करने वाले व्यक्ति को स्वस्थ पशुओं के संपर्क में नहीं आना चाहिए। संक्रमण की स्थिति में सामूहिक चराई पर रोक लगाई जाए और यदि किसी पशु की मृत्यु हो जाए तो उसका शव खुले में न फेंककर वैज्ञानिक विधि से दफनाया जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह रोग केवल पशुओं तक सीमित है और मनुष्यों में नहीं फैलता है, अतः किसी प्रकार की अफवाहों पर ध्यान न दिया जाए।
जिलाधिकारी के निर्देशानुसार जनपद में एल.एस.डी. के प्रसार को रोकने और उपचार सुनिश्चित करने के लिए सभी 16 विकास खंडों के खंड विकास अधिकारियों को सेक्टर मजिस्ट्रेट तथा उप जिलाधिकारियों को तहसीलवार जोनल मजिस्ट्रेट नामित किया गया है। सभी विकास खंडों में उपचार हेतु रैपिड रिस्पांस टीम गठित की गई है। जनपद स्तर पर राजकीय पशु चिकित्सालय, देवरिया सदर में नियंत्रण कक्ष स्थापित किया गया है, जिसके प्रभारी डॉ. ओ.पी. प्रजापति, उपमुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी (मोबाइल नं. 9451955864) को नामित किया गया है। बाहरी जनपदों से गोवंशीय एवं महिषवंशीय पशुओं के परिवहन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है तथा अग्रिम आदेशों तक पशु हाट और मेलों का आयोजन भी स्थगित रहेगा।
डॉ. वैश्य ने उपचार संबंधी जानकारी देते हुए बताया कि बीमार और स्वस्थ दोनों प्रकार के पशुओं को रोग से बचाने के लिए होम्योपैथिक दवाओं का उपयोग करना लाभकारी है। उन्होंने कहा कि “लम्पी आउट”, “एल.एस.डी.-25” तथा “फीवर आउट” नामक दवाओं की 30 बूंदें दिन में चार बार पिलानी चाहिए। इसके अलावा रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए आयुर्वेदिक औषधियों का प्रयोग भी कारगर है। गुड़ (500 ग्राम), गिलोय या गुरूच (250 ग्राम), तुलसी पत्ते (100 ग्राम), लौंग (10 ग्राम), काली मिर्च (10 ग्राम), दालचीनी (10 ग्राम), पिपर (10 ग्राम) और चिरायता (10 ग्राम) को मिलाकर पाउडर तैयार किया जाए और इसे पांच लीटर पानी में उबालकर छान लिया जाए। इस काढ़े की लगभग 100 मिलीग्राम मात्रा सुबह और शाम पशुओं को पिलाई जानी चाहिए। यह नुस्खा न केवल संक्रमित बल्कि स्वस्थ पशुओं के लिए भी लाभकारी है। इसके साथ ही नीम के पत्तों को उबालकर प्राप्त पानी से प्रभावित पशुओं की साफ-सफाई और धुलाई करनी चाहिए।
उन्होंने बताया कि यदि पशुओं के शरीर पर गांठें बन जाएं तो एन.डी.डी.बी. द्वारा अनुशंसित हर्बल पेस्ट का प्रयोग करना चाहिए। इसके लिए हल्दी (20 ग्राम), नीम की पत्ती (20 ग्राम), शरीफा का पत्ता (20 ग्राम), लहसुन की दो कलियां, तुलसी पत्ता (20 ग्राम) और मेहंदी का पत्ता (20 ग्राम) को पीसकर मिश्रण तैयार किया जाए। इस मिश्रण में 10 ग्राम कपूर और 250 ग्राम नारियल तेल मिलाकर पेस्ट बनाया जाता है, जिसे घाव पर दिन में दो बार लगाया जाना चाहिए। वहीं मच्छरों की रोकथाम के लिए नीम के पत्तों का धुआं प्रतिदिन शाम चार बजे से सात बजे तक करना भी अत्यंत प्रभावी उपाय है।







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