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सोमवार, 5 सितंबर 2022

शिक्षक दिवस पर विशेष


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०५ सितम्बर/ शिक्षक दिवस-
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०५ सितंबर १८८८ को चेन्नई से लगभग २०० किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में स्थित एक छोटे से कस्बे तिरुताणी में डॉक्टर राधाकृष्णन का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम सर्वपल्ली वी. रामास्वामी और माता का नाम श्रीमती सीता झा था। रामास्वामी एक गरीब ब्राह्मण थे और तिरुताणी कस्बे के जमींदार के यहां एक साधारण कर्मचारी के समान कार्य करते थे।

डॉक्टर राधाकृष्णन अपने पिता की दूसरी संतान थे। उनके चार भाई और एक छोटी बहन थी छः बहन-भाईयों और दो माता-पिता को मिलाकर आठ सदस्यों के इस परिवार की आय अत्यंत सीमित थी। इस सीमित आय में भी डॉक्टर राधाकृष्णन ने सिद्ध कर दिया कि प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती। उन्होंने न केवल महान शिक्षाविद के रूप में ख्याति प्राप्त की, बल्कि देश के सर्वोच्च राष्ट्रपति पद को भी सुशोभित किया।

स्वतंत्र भारत के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन को बचपन में कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। सर्वपल्ली राधाकृष्णन का शुरुआती जीवन तिरुतनी और तिरुपति जैसे धार्मिक स्थलों पर ही बीता।

यद्यपि इनके पिता धार्मिक विचारों वाले इंसान थे लेकिन फिर भी उन्होंने राधाकृष्णन को पढ़ने के लिए क्रिश्चियन मिशनरी संस्था लुथर्न मिशन स्कूल, तिरुपति में दाखिल कराया। 
वह शुरू से ही एक मेधावी छात्र थे।

अपने विद्यार्थी जीवन में ही उन्होंने बाइबल के महत्वपूर्ण अंश याद कर लिए थे, जिसके लिए उन्हें विशिष्ट योग्यता का सम्मान भी प्रदान किया गया था। उन्होंने वीर सावरकर और विवेकानंद के आदर्शों का भी गहन अध्ययन कर लिया था। सन १९०२ में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा अच्छे अंकों में उत्तीर्ण की जिसके लिए उन्हें छात्रवृत्ति प्रदान की गई।

कला संकाय में स्नातक की परीक्षा में वह प्रथम आए। इसके बाद उन्होंने दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर किया और जल्द ही मद्रास रेजीडेंसी कॉलेज में दर्शनशास्त्र के सहायक प्राध्यापक नियुक्त हुए। डॉ.राधाकृष्णन ने अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से विश्व को भारतीय दर्शन शास्त्र से परिचित कराया।

 दाम्पत्य जीवन-
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उस समय मद्रास के ब्राह्मण परिवारों में कम उम्र में ही शादी सम्पन्न हो जाती थी और राधाकृष्णन भी उसके अपवाद नहीं रहे। १९०३ में १६ वर्ष की आयु में ही उनका विवाह दूर के रिश्ते की बहन 'सिवाकामू' के साथ सम्पन्न हो गया। उस समय उनकी पत्नी की आयु मात्र १० वर्ष की थी।
  व्यक्तित्व-
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डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारतीय संस्कृति के ज्ञानी,एक महान शिक्षाविद, महान दार्शनिक, महान वक्ता होने के साथ ही विज्ञानी हिन्दू विचारक भी थे। राधाकृष्णन ने अपने जीवन के ४० वर्ष एक शिक्षक के रूप में बिताए।

वह एक आदर्श शिक्षक थे। डॉक्टर राधाकृष्णन के पुत्र डॉक्टर एस.गोपाल ने १९८९ में उनकी जीवनी का प्रकाशन भी किया। इसके पूर्व डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के व्यक्तित्व तथा जीवन की घटनाओं के सम्बन्ध में किसी को भी आधिकारिक जानकारी नहीं थी।

स्वयं उनके पुत्र ने भी माना कि उनके पिता की व्यक्तिगत ज़िदंगी के विषय में लिखना एक बड़ी चुनौती थी और एक नाजुक मामला भी। लेकिन डॉक्टर एस. गोपाल ने १९५२ में न्यूयार्क में‘लाइब्रेरी ऑफ़ लिविंग फिलासफर्स’के नाम से एक श्रृंखला पेश की जिसमें सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बारे में आधिकारिक रूप से लिखा गया था। स्वयं राधाकृष्णन ने उसमें दर्ज सामग्री का कभी खंडन नहीं किया।

  राजनीतिक सफर
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इस समय तक डॉ.राधाकृष्णन अपनी प्रतिभा का लोहा बनवा चुके थे। राधाकृष्णन की योग्यता को देखते हुए उन्हें संविधान निर्मात्री सभा का सदस्य बनाया गया था। जब भारत को स्वतंत्रता मिली उस समय जवाहरलाल नेहरू ने राधाकृष्णन से यह आग्रह किया कि वह विशिष्ट राजदूत के रूप में सोवियत संघ के साथ राजनयिक कार्यों की संपन्न करें। १९५२ तक वह राजनयिक रहे। इसके बाद उन्हें उपराष्ट्रपति के पद पर नियुक्त किया गया।

संसद के सभी सदस्यों ने उन्हें उनके कार्य व्यवहार के लिए काफ़ी सराहा। १९६२ में राजेन्द्र प्रसाद का कार्यकाल समाप्त होने के बाद राधाकृष्णन ने राष्ट्रपति का पद संभाला। राजेंद्र प्रसाद की तुलना में इनका कार्यकाल काफी चुनौतियों भरा था। क्योंकि जहां एक ओर भारत के चीन और पाकिस्तान के साथ युद्ध हुए जिसमें चीन के साथ भारत को हार का सामना करना पड़ा तो वहीं दूसरी ओर दो प्रधानमंत्रियों का देहांत भी इन्हीं के कार्यकाल के दौरान ही हुआ था।

१९६७ के गणतंत्र दिवस पर डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने देश को सम्बोधित करते हुए यह स्पष्ट किया था कि वह अब किसी भी सत्र के लिए राष्ट्रपति नहीं बनना चाहेंगे। बाद में कांग्रेस के नेताओं ने इसके लिए उन्हें कई बार मनाने की भी कोशिश की लेकिन उन्होंने अपनी घोषणा पर अमल किया।

शिक्षा और राजनीति में उत्कृष्ट योगदान देने के लिए भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ.राजेंद्र प्रसाद ने महान दार्शनिक शिक्षाविद और लेखक डॉ.राधाकृष्णन को देश का सर्वोच्च अलंकरण “भारत रत्न” प्रदान किया।
 
राधाकृष्णन के मरणोपरांत उन्हें मार्च १९७५ में अमेरिकी सरकार द्वारा "टेम्पलटन" पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो कि धर्म के क्षेत्र में उत्थान के लिए प्रदान किया जाता है। इस पुरस्कार को ग्रहण करने वाले वह प्रथम गैर-ईसाई सम्प्रदाय के व्यक्ति थे।  

डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का निधन-
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डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन सामाजिक बुराइयों को हटाने के लिए शिक्षा को ही कारगर मानते थे। शिक्षा को मानव व समाज का सबसे बड़ा आधार मानने वाले डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन का शैक्षिक जगत में अविस्मरणीय व अतुलनीय योगदान रहा है।

जीवन के उत्तरार्द्ध में भी उच्च पदों पर रहने के दौरान शैक्षिक क्षेत्र में उनका योगदान सदैव बना रहा। १७ अप्रैल, १९७५ को सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने लंबी बीमारी के बाद अपना देह त्याग दिया। लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में उनके कार्यों की वजह से आज भी उन्हें एक आदर्श शिक्षक के रूप में याद किया जाता है।

भारत का गौरवशाली इतिहास, भारत की महान शिक्षक परम्परा में शिक्षक बनना सबसे बड़ा उत्तरदायित्व हैं, क्योंकि एक शिक्षक वह दिशासूचक है जो जिज्ञासा, ज्ञान और बुद्धिमानी के चुम्बक को सक्रिय बनाता है।     

शिक्षक की गोद में 
उत्थान पलता है। 
सारा जहां शिक्षक के 
पीछे ही चलता है। 
शिक्षक का बोया हुआ 
पेड़ बनता है। 
वही पेड़ हजारों बीज जनता है।

शिक्षक काल की गति को 
मोड़ सकता है। 
शिक्षक धरा से अम्बर को 
जोड़ सकता है। 
शिक्षक की महिमा 
महान होती है। 
शिक्षक बिन अधूरी हूँ 
ये वसुन्धरा कहती है। 
याद रखें चाणक्य ने 
इतिहास बना डाला था। 
क्रूर मगध राजा को 
मिट्टी में मिला डाला था।

बालक चन्द्रगुप्त को 
चक्रवर्ती सम्राट बनाया था। 
एक शिक्षक ने अपना 
लोहा मनवाया था। 
संदीपनी से गुरु सदियों से 
होते आये है। 
कृष्ण जैसे नन्हें-नन्हें 
बीज बोते आये है। 
शिक्षक से ही अर्जुन 
और युधिष्ठिर जैसे नाम है। 
शिक्षक की निंदा करने से 
दुर्योधन बदनाम है।

शिक्षक की ही दया दृष्टि से 
बालक राम बन जाते है। 
शिक्षक की अनदेखी से 
वे रावण भी कहलाते है। 
हम सब ने भी शिक्षक 
बनने का सुअवसर पाया है। 
बहुत बड़े दायित्व को 
हमने गले लगाया है।

आओ हम संकल्प करे 
की अपना दायित्व निभायेंगे। 
अपने प्यारे भारत को 
हम जगतगुरु बनायेंगे। 
अपने शिक्षक होने का 
हरपल सम्मान करेंगे। 
इस समाज में हम भी 
अपना शिक्षा-दान करेंगे।
*सम्पूर्ण शिक्षक-वर्ग को समर्पित*
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