संवाददाता रामविलास गौतम
पीलीभीत
श्रीमती सुखवंत बिंद्रा मुझे याद है आज करीब 64 साल पहले जब 1958 में पंजाब से हम ग्राम माला ( पीलीभीत) आए थे पूरा इलाका बंजर था। पेड़ों की जड़ों और झाड़ियों को उखाड़ने के लिए 6 बड़े ट्रैक्टर का प्रयोग किया गया।
5 साल कठोर परिश्रम के बाद यह जमीन खेती योग्य बनी और यह 580 एकड़ का फॉर्म इलाके का सबसे उन्नत फॉर्म बन गया
आज उतनी जमीन नहीं है हमारे पास, लेकिन हम नेचुरल फार्मिंग की तरफ जा रहे हैं।
केमिकल फर्टिलाइजर और पेस्टिसाइड बिलकुल भी प्रयोग नहीं करते।
आज अगर जमीन को बचाना है तो नेचुरल फार्मिंग अपनाना अनिवार्य है।
,क्रॉप रोटेशन जमीन को शक्ति देता है।
अगर हम लोग शत-प्रतिशत जमीन में गेहूं और धान न लगाकर तरह-तरह के दलहन और तेल वाले अनाज लगाएं तो जमीन की शक्ति बढ़ेगी और मार्केट रेट भी ठीक रहेंगे।
बिंद्रा फार्म में हम अपनी गायों को भी बीमार होने पर देसी जड़ी बूटी देते हैं। यही कारण है अच्छे और स्वादिष्ट दूध का।
शुरू में जब हम आए ही थे, चारों तरफ रेत ही रेत थी। कोई भी हरा पेड़ नहीं था, हां मुझे याद है कि वहां पर एक ही पुराना सूखा गुलर का पेड़ हुआ करता था, और उसके खोखले तने में टूटा शीशा डाला करते थे
बिंद्रा जी की सोच और हम लोगों ने इलाके में बदलाव किया उनके न होने पर भी सोच को आगे बिंद्रा मैडम ने बढ़ाया।
- आम के बाग लगाए ।
- सागवान पेड़ों का प्लांटेशन किया।
- नीची जमीन को तलाब में बदला ।
(जहां पर हमने फिश फार्मिंग शुरू करी)
- बम्बू प्लांटेशन किया।
- मधुमक्खी पालन शुरू किए।
- देसी साहिवाल गाय ब्रीडिंग करी।
- सोलर ट्यूबवेल लगाए ।
- गोबर गैस प्लांट लगाया । (1974 से रसोई में कोई लकड़ी नही जलाई।)
- देसी मेडिसिनल प्लांट्स लगाए। (जिसमें शतावर तुलसी,एलोवेरा, गिलोए.
- बिंद्रा फार्म से बायोडिग्रेडेबल वेस्ट से वर्मिकमपोस्ट और नॉन बायोडिग्रेडेबल वेस्ट को सूखा अलग करके बेच दिया जाता है।
- मशरूम फार्मिंग करी।
अब बिंद्रा फार्म मालाबार नीम प्लांटेशन कर रहा हैं। जिसको दीमक नही लगती रेट अच्छे मिलते हैं।
क्योंकि चारों तरफ के गांव वाले और बंगाली कॉलोनी के निवासी इनसे प्रेरित रहते हैं बिंद्रा फार्म, उदाहरण बना है इलाके के लिए , आज मधुमक्खी पालन मशरूम फार्मिंग इन कॉलोनी और गांव में एक घर घर का व्यवसाय बना हुआ है।
मिशन परिवर्तन
मैडम कहती हैं,
हमे अपनी सोच बदलनी है।
सिंगल डस्टबिन कांसेप्ट नहीं चलेगा मुझे याद है वही वाला पुराना गुलर का पेड़ जिसमें हमने 50 साल तक टूटे शीशे एकत्र होते रहे, और जब उसको खाली किया उसने से 750 किलो टूटा हुआ शीशा निकला जो ₹2 प्रति किलो बिका।
पैसा जरूरी नहीं, पर सोच जरूरी थी अगर टूटा शीशा जमीन पर फेंकते तो किसी न किसी के पैर काटता है या नुकसान करता,अब यह रिसाइकल हो सकेगा।
इसी तरह पेपर ,पॉलिथीन और पैकिंग मैटेरियल और हरा वेस्ट अलग रख कर गार्बेज बनने से रोकना होगा।
आज इसको जलाना वातावरण के लिए बहुत घातक है, ग्लोबल वार्मिंग से हम सब जाग्रत हैं।
हमें वन टाइम यूज़ प्लास्टिक और पॉलिथीन को भी कम करना है, दूध,दही,घी, के पैकेट हर रोज घर में आते है, अगर उनको धोकर रख ले, तो अच्छे दामों में बिक कर रिसाइकल हो सकता है।
एक बात और इलाके में आते ही शन 1958 में ही दो इंडियन टॉयलेट बनाए जिसका प्रयोग सब करते है फिर भी पक्का सेप्टिक टैंक आज तक खाली करने की आवश्यकता नहीं पड़ी, कारण देसी स्ल्यूरी है जिसमें 1 किलो पुराना दही, गुड और गोबर सड़ा कर हर 6 महीने में टॉयलेट में डालते है,जिससे मल खाने वाले कीड़े पैदा होते हैं,और टैंक कभी भरता ही नही।
परंतु यहां टॉयलेट में कभी एसिड नही डालते।
ये तरीका इलाके से न केवल बदबू दूर करता है पैसे भी बचते हैं
मिस्टर वी एस बिंद्रा 2001 में एक हादसे में हमें छोड़ कर चले गए लेकिन उसके बाद भी उन्होंने अपना दिल नहीं छोड़ा और समाज को आईना दिखाने का कार्य करती रहीं।
इनका इकलौता बेटा कर्नल पी एस बिंद्रा आज फौज में कर्नल के पद पर तैनात है। और इन्हें पूरी आशा है, जो 21 साल का सफर उन्होंने अकेले गुजरा है, इनका बेटा वापस आकर इनके साथ प्रोजेक्ट पूरा करेगा ।
आज अपने फार्म पर मिसेज बिंद्रा अपने नेचुरल उपयोग द्वारा, तितली, बया,केचुए, गिद्ध, गौरैया जो नजर से लुप्त हैं उनको वापस लाने में तन मन से लगीं हैं।
जरूरत है आपके साथ की और मिशन परिवर्तन के फैलाव की ताकि पूरे देश के लोग समझें और अपना सकें






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