कोलकाता । दिल में घबराहट सी हो रही थी। भीड़ बढ़ती जा रही थी कुछ अनहोनी होने का डर लग रहा था। कुछ समझ में आता उससे पहले ही चीखें सुनाई देने लगी। लोग भागने लगे और जमीन पर गिरने लगे। जो गिरा वह उठ नहीं पाया। लोगों की भीड़ उन्हें कुचलते हुए भाग रही थी। कुछ ही देर में जहां रौनक थी, वहां लाशें पड़ी थीं। चारों तरफ जूते-चप्पल बिखड़े पड़े थे। लोगों के दुपट्टे और कपड़ों के चीथड़े बिखरे पड़े थे। यह सीन था कोलकाता के चोरबागान दुर्गा पंडाल का। कई लोग अपनों की तलाश में पूरी रात भटकते रहे। जो घायल होने के बाद जिंदा बचे, वे अब भी दहशत में हैं। लोगों ने बताया कि किस तरह उनकी आंखों के सामने सब हुआ।
तेज बारिश से बचने के लिए दुर्गा पूजा पंडाल में उमड़ी भीड़ अचानक भगदड़ में बदल गई और 25 वर्षीय सोनू पाल की आंखों के सामने उनकी मां की जान चली गई। सदमे में डूबे सोनू ने उस भयावह पल को याद किया और बताया कि किस तरह उनकी मां को उनकी आंखों के सामने रौंद दिया गया।
सोनू पाल ने बताया कि मैंने अपनी मां को आंखों के सामने मरते देखा। शायद मैं भी जिंदा नहीं बच पाता। कुमारटुली निवासी पाल अपनी मां के साथ दुर्गा पूजा देखने गए थे, तभी अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। उन्होंने कहा कि बाहर बारिश हो रही थी और कोई भी बाहर नहीं निकलना चाहता था। बारिश से बचने के लिए प्रवेश द्वार पर खड़े लोग अंदर जाने के लिए लगातार धक्का-मुक्की कर रहे थे। पाल ने बताया कि जल्द ही भीड़ का दबाव असहनीय हो गया। दबाव सहन नहीं कर पाने के कारण अंदर मौजूद सभी लोग एक-दूसरे के ऊपर गिरने लगे।
सोनू ने बताया कि मैं भी भीड़ के नीचे दब गया था। किसी तरह खुद को संभालकर मैं अपनी मां के पास पहुंचा, लेकिन वह वहां नहीं थीं। दूर नजर पड़ी तो मां जमीन पर पड़ी थीं, लोग उन्हें कुचलते हुए भाग रहे थे। मैं मां को बचाने के लिए दौड़कर उनके पास जाना चाहता था लेकिन भीड़ के चलते ऐसा नहीं कर पाया।
मैं और मेरी पत्नी दोपहर करीब 1 बजे चकदाह से कोलकाता पहुंचे और सीधे संतोष मित्रा स्क्वायर चले गए। वहां भीड़ का प्रबंधन ठीक-ठाक था और लोगों को व्यवस्थित तरीके से आगे भेजा जा रहा था। मेरी पत्नी चोरबागन पंडाल जाना चाहती थी क्योंकि उसने कई रील्स में इसके अंदर का नजारा देखा था। मैंने उसे बताया कि वहां बहुत भीड़ होगी और सुझाव दिया कि हम वहां न जाकर कुमारतुली पार्क चले जाएं। लेकिन वह जिद पर अड़ी रही, और मैं उसे मना नहीं कर सका। जब हम चोरबागन पहुंचे, तो वहां बहुत भीड़ थी। भीड़ सेंट्रल एवेन्यू तक फैल गई थी। हम एक अव्यवस्थित कतार में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करने लगे। तभी अचानक बारिश शुरू हो गई, जिससे मैं चिंतित हो गया। हर गुजरते मिनट के साथ भीड़ बढ़ती जा रही थी, लेकिन वहां किए गए इंतजाम नाकाफी लग रहे थे।'
अचानक, लोग पंडाल की ओर तेजी से बढ़ने लगे। बारिश शुरू होते ही, स्वयंसेवकों ने बैरिकेड्स हटा दिए और लोगों को अंदर जाने दिया- शायद उन्हें डर था कि कहीं लोग वापस न चले जाएं। हमें खुद अंदर जाने की कोशिश भी नहीं करनी पड़ी। भीड़ ने हमें धक्का देकर अंदर धकेल दिया। पंडाल के अंदर पूरी तरह अंधेरा था और वहां लोगों की भारी भीड़ थी। सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था। अचानक, पीछे से लोगों ने धक्का देना शुरू कर दिया और कुछ ही पलों में भगदड़ मच गई। मैं जमीन पर गिर गया और मेरी पत्नी मुझसे अलग हो गई।'
लोग रोते-चिल्लाते अपनों को ढूंढ रहे थे''अगले कुछ मिनटों में क्या हुआ, मुझे ठीक से याद नहीं है। लोग चिल्ला रहे थे और चीख-पुकार मची थी। मैं अपनी पत्नी को पुकारता रहा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। बाहर निकलने की कोशिश कर रहे लोगों से की भीड़ में मुझे कई धक्के लगे और लातें पड़ीं। जैसे ही मैं किसी तरह उठकर खड़ा हुआ, मैंने घबराकर आरती को खोजना शुरू कर दिया। लोग जमीन पर पड़े थे, और उनके साथ आए लोग मदद के लिए रो-चिल्ला रहे थे। लेकिन वहां कोई स्वयंसेवक, पुलिसकर्मी या आयोजक मदद के लिए आगे आता नहीं दिखा।'
'कुछ मिनटों के बाद, मैंने अपनी पत्नी को जमीन पर बेसुध पड़े देखा। मैंने उसे अपनी बाहों में उठाया और मदद के लिए पुकारा। उसे अस्पताल ले जाने के लिए कोई एम्बुलेंस मौजूद नहीं थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वह जिंदा है या मर चुकी है। उसे अस्पताल ले जाने के लिए एम्बुलेंस का इंतजाम करने में एक घंटे से ज्यादा का समय लग गया। जब हम वहां पहुंचे, तो डॉक्टरों ने मुझे बताया कि उसे मृत अवस्था में ही लाया गया था। अब, वे मुझे उसे देखने के लिए अंदर भी नहीं जाने दे रहे हैं। हमसे कहा गया है कि सुबह पुलिस स्टेशन जाएं।'
जब हम घर से निकले थे, तो हम बहुत खुश थे और कोलकाता में एक साथ समय बिताने के लिए उत्साहित थे। हमने पूजा का आनंद लेने, पंडालों में जाने और साथ में रात का खाना खाने की योजना बनाई थी। मुझे जरा भी अंदाजा नहीं था कि यह मेरी पत्नी के साथ मेरी आखिरी पूजा होगी।







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