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बुधवार, 28 मई 2025

अश्लीलता के मंच पर नारी गरिमा का अपमान: देवी से 'आइटम' तक गिरती सोच


 

रुद्रपुर, बाज़ार। विवाह समारोहों, मेलों और सार्वजनिक आयोजनों में इन दिनों आर्केस्ट्रा और स्टेज प्रोग्राम के नाम पर जादू साज़िश गैंगली जा रही है। युवतियों द्वारा अश्लील साहित्य पर देह प्रदर्शन और पुरुष दर्शकों द्वारा की जा रही अभद्र समानता और विचारधाराओं ने समाज के विचारशील वर्ग को गंभीर चिंता में डाल दिया है। इस विषय पर शहर के प्रमुख शिक्षा समर्थकों, समाजसेवियों और कलाकारों ने मीडिया से बातचीत में बातचीत बातचीत की।

                 शिक्षाविद् विद्वान राणा प्रताप सिंह ने कहा है कि भारतीय संस्कृति में जहां कन्याओं को देवी का रूप माना जाता है, वहां यह अत्यंत भिन्न है, जहां आज आर्केस्ट्रा जैसे मंचों पर नवीन कन्याओं को 'आइटम' प्रस्तुत किया जा रहा है। उनका मानना ​​है कि यह केवल कला का अपमान नहीं है, बल्कि समाज के नैतिक पतन का भी संकेत है। जानेमाने शिक्षाविद् डॉ. रविकांत मणि त्रिपली ने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जब बच्चे और किशोर ऐसी प्रस्तुतियाँ देखते हैं, तो उनके अंदर नारी के प्रति दृष्टिकोण अलग-अलग हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि यही मानसिक मनोविज्ञान आगे चलकर महिला अपराध को जन्म देता है। मूर्तिकार रामप्रवेश भारती ने टिप्पणी की कि जिस कन्या को हम दुर्गा-काली का रूप मानते हैं, आज उसी के शरीर पर गधाकर फब्तियां कसने वालों की भीड़ तालियां पीट रही हैं। उन्होंने इसे एक सभ्य समाज के लिए शर्मनाक दृश्य बताया और कहा कि यह सब हमारी सामूहिक शैलियाँ और तटस्थता का ही परिणाम है। 

              वरिष्ठ नाटककार नागेंद्र राव ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार के कार्यक्रम केवल सामाजिक नहीं, बल्कि कानूनी दृष्टि से भी आजमाए जाते हैं। उन्होंने बताया कि सार्वजनिक स्थलों पर दुष्प्रचार भारतीय न्याय संहिता की धारा के तहत दंडनीय अपराध है, और सरकार को इस पर तत्काल सख्त कानून बनाना चाहिए। कट्टर लोकगायिका पूनम मणि त्रिपली ने गहरी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि लोक गायक को जिस तरह अश्लीलता में लपेटा जा रहा है, वह हमारी लोक-संस्कृति की हत्या है। उनका मानना ​​है कि लोकगायन जनजीवन की आत्मा है और इसे बाजारू सोच से दूर रखना जरूरी है। संगीताचार्य नित्यानंद ने कहा कि संगीत को केवल मनोरंजन का माध्यम बनाया गया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि संगीत आत्मा को पढ़ने वाली साधना है, न कि बाजार की वस्तु; और इस भरोसे को अब वापस ही मिलेगा। 

              इन सभी विचारों के बीच एक बात स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आती है—अब समय आ गया है कि प्रशासन इस विषय पर चयन से विचार करे। समाज के इन असंबद्धों ने एक स्वर में यह मांग रखी कि ऐसे आयोजनों की मस्जिद पर निगरानी रखी जाए, बिना किसी अनुमति के कार्यक्रम पर पूर्ण रोक लगाई जाए और कलाकारों के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाए। साथ ही, शिक्षा स्नातक, प्रमुख और सामाजिक विद्वानों को सामूहिक सांस्कृतिक स्वतंत्रता की पुनर्स्थापना का प्रयास करना होगा।

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