राजेश राज
देशव्यापी किसान आंदोलन 11 दिसंबर को जश्न मनाने जा रहा है। किसी ने मुझसे पूछा कि क्या यह उचित है? क्या हमें भी हर्षोउल्लास में हर्षित होना चाहिए।क्या एक दुसरे को बधाई दी जाय?
मैं कहा-हां। बिल्कुल दोस्त।यह जीत हमारी-आपकी सबकी है। इसमें हम सबको शामिल करके व्यापकता लायी गई थी।इस आंदोलन को शुरूआत से ही मेहनतकश परिवार-गांव सहित किसान व मजदूर के बल पर साल भर तक चलाया गया।इस लामबंदी में हर वर्ग के किसान जुटे थे।
शुरू से ही न्यूनतम पांच केन्द्रीय मुद्दों पर हमारी एकजुटता रही है ,उसपर जीत भारतीय जनमानस की जीत है। आईए हम मिलजुलकर खुशियों को बांटें।
लेकिन साथियों,इन मुद्दों के अलावा भी हम सबके और भी मुद्दें रहे हैं जो तब गौड़ थे लेकिन अब प्रधान हो चुके हैं(2यू-मिशन के साथ)। आगे अतः हमलोगों को पुनर्गठन करने की जरुरत है।जागते रहें।शोषक शासक वर्ग के राजसत्ता की दो तरह की साजिशों पर निगाह डालने की जरूरत है:-
1. शोषक शासक वर्ग की हमेशा पहली साजिश रही है कि किसी भी मुद्दे को अन्य मुद्दों से अलग-थलग करके सोचने का दिमाग पैदा किया जाए ताकि अन्याय के खिलाफ व्यापक विद्रोह ना उठ खड़ा हो । शासक वर्ग हमेशा विद्रोह व इंक़लाब के दावानल से बचने के लिए हमारे आंदोलनों में दिवार खड़ा करता है। इसके लिए उत्तर आधुनिकतावादी(postmordernism) व उत्तर सतयुग(post truth)के विभिन्न दार्शनिक मौजूद हैं। इसीलिए किसान आंदोलन,मजदूर आंदोलन,छात्र-नौजवान-बेरोजगार आंदोलन,महिला आंदोलन,दलित आंदोलन,आदिवासी आंदोलन,जाति उन्मूलन आंदोलन , राष्ट्रीयता के आंदोलन सबको जुदा-जुदा करके देखने वालों की भरमार हैं।वे हमारे अपने-अपने बंद खिड़कियों,दरवाजों को खोलकर हवाओं को आने-जाने देने को रोक देना चाहते हैं। जनता को खंड-खंड बांटकर अखंड भारत की कल्पना करते हैं।वे नहीं चाहते की हमारी चट्टानी एकता बने जिसमें
हर अन्यायी व्यवस्थाविरोधी खुशी सबकी ख़ुशी ,हर आंदोलनकारी का दुख सबका दुख का अहसास बने।
2.दूसरी शासक वर्ग द्वारा साजिश होती रही है कि अपने प्रचार तंत्र द्वारा आन्दोलन में कुछ या कोई व्यक्ति विशेष व मसीहा की कारामात को स्थापित करना।नतीजतन कभी नेतृत्व तो कभी आम जनसमुदाय की भूमिका व योगदान को पीछे कर दिया जाता है।जनता,नेता व क्रांतिकारी पार्टी के बीच अंतर्संबंधों को काटकर हेडलेस चिकेन जैसे बनाने की साजिशें होती हैं। जनता को तेजी से राज्यसत्ता की मैनेजिंग कमेटी वाली सांपनाथ पार्टी बनाम नागनाथ पार्टी या अजगरनाथ पार्टी में एक को जल्दी से चुन लेने का विकल्प दिया जाता है। इसके अलावा कोई विकल्प कहां ?
एक मंजिल की लड़ाई जीतने के बाद दूसरे मंजिल की लड़ाई में उतरने की जरूरत है।बना-बनाया विकल्प नहीं मिलता तो उसको बनाना पड़ेगा।विकल्प नहीं रहने पर भी विकल्प निर्माण हुए हैं।जैसे कभी पेरिस कम्यून में,कभी रूस में कभी चीन में।
🙋♂️" किसान आन्दोलन के विजय पर " पंजाब के लोकप्रिय जनकवि *पाश* की इंकलाबी कविता के साथ सभी इंकलाबी साथी को हुल जोहार ।
*हम लड़ेंगे साथी*
हम लड़ेंगे साथी,
उदास मौसम के लिए
हम लड़ेंगे साथी, ग़ुलाम इच्छाओं के लिए
हम चुनेंगे साथी, ज़िन्दगी के टुकड़े
हथौड़ा अब भी चलता है,
उदास निहाई पर
हल अब भी चलता हैं चीख़ती धरती पर
यह काम हमारा नहीं बनता है,
सवाल नाचता है
सवाल के कन्धों पर चढ़कर
हम लड़ेंगे साथी
क़त्ल हुए जज़्बों की क़सम खाकर
बुझी हुई नज़रों की क़सम खाकर
हाथों पर पड़े गाँठों की क़सम खाकर
हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगे तब तक
जब तक वीरू बकरिहा
बकरियों का पेशाब पीता है
खिले हुए सरसों के फूल को
जब तक बोने वाले ख़ुद नहीं सूँघते
कि सूजी आँखों वाली
गाँव की अध्यापिका का पति जब तक
युद्ध से लौट नहीं आता
जब तक पुलिस के सिपाही
अपने भाइयों का गला घोंटने को मज़बूर हैं
कि दफ़्तरों के बाबू
जब तक लिखते हैं लहू से अक्षर
हम लड़ेंगे जब तक
दुनिया में लड़ने की ज़रूरत बाक़ी है
जब बन्दूक न हुई, तब तलवार होगी
जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी
लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की ज़रूरत होगी
और हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगे
कि लड़े बग़ैर कुछ नहीं मिलता
हम लड़ेंगे
कि अब तक लड़े क्यों नहीं
हम लड़ेंगे
अपनी सज़ा कबूलने के लिए
लड़ते हुए मर जाने वाले की
याद ज़िन्दा रखने के लिए
हम लड़ेंगे।






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