देवरिया 18 अक्टूबर। जिला कृषि रक्षा अधिकारी रतन शंकर ओझा ने बताया है कि जनपद में जे०ई० / ए०ई०एस० रोग की रोकथाम हेतु विशेष संचारी रोग नियंत्रण पखवाड़ा के अन्तर्गत चूहा एवं छछूंदर नियंत्रण कार्यक्रम चलाया जायेगा जो 19 अक्टूबर से 17 नवंबर तक चलेगा । अभियान के अन्तर्गत कार्यक्रम चलाकर समस्त कृषकों / जनसमुदाय को रोग से बचाव एवं नियंत्रण हेतु जागरूक किया जायेगा। चूहा नियंत्रण का साप्ताहिक कार्यक्रम अभियान जे0ई० / ए०ई०एस० रोग की रोकथाम हेतु विशेष संचारी रोग नियंत्रण पखवाड़ा के अन्तर्गत चूहा एवं छछूंदर नियंत्रण चूहा नियंत्रण अभियान के अंतर्गत तिथिवार किये जाने वाले कार्य प्रथम दिन क्षेत्र भ्रमण एवं कार्यस्थल की पहचान करना ,दूसरा दिन खेत / क्षेत्र का निरीक्षण एंव बिलो को बन्द करते हुये चिन्हित कर झण्डे लगाये तीसरा दिन-खेत / क्षेत्र का निरीक्षण कर जो बिल बंद हो वहा झण्डे हटा दे, जहा पर बिल खुले पाये वहां पर झण्डा लगे रहने दे खुले बिल में एक भाग सरसो का तेल एवं 48भाग भुना चना / गेंहू / चावल आदि से बने चारे को बिना जहर मिलाये बिल में रखे चौथा दिन बिलो का निरीक्षण कर बिना जहर का चारा पुनः रखे। पांचवा दिन-जिंक फास्फाईड 80 प्रतिशत की 01 ग्राम मात्रा को 01 ग्राम सरसों तेल व 48 ग्राम भुना चना / गेहू आदि से बने चारे को बिल में रखें छठवां दिन-बिलो का निरीक्षण करें तथा मरे चूहो को एकत्र कर जमीन में गाड़ दे। सातवा दिन-विलो को पुनः बन्द कर दे। अगले दिन यदि बिल खुले पायें जाए तो कार्यक्रम पुनः अपनाये । चूहा नियंत्रण की अन्य विधाएं: है, भूरा चूहा खेत / क्षेत्र व घर में दोनों में तथा जंगली चूहा जंगल रेगिस्तान, झाडियों में पाया जाता है । चूहे की संख्या नियंत्रित करने के लिये अन्न भण्डारण पक्का कंकीट तथा धातु से बनी चरखारी / पात्रों में करना चाहिए ताकि उनको भोज्य पदार्थ सुगमता से उपलब्ध न हो । चूहे अपना बिल झाडियों, मेंडो, फूडो आदि में स्थायी रूप से बनाते है । खेता / क्षेत्रों का समय समय पर निरिक्षण एवं साफ-सफाई करके उनकी संख्या नियंत्रित कर सकते है । चूहों के प्राकृतिक शत्रुओं- बिल्ली, साप, उल्लू बाज, चमगादड़ आदि द्वारा चूहों को भोजन के रूप में प्रयोग किया जाता है । इनको संरक्षण देने से चूहों की संख्या नियंत्रित हो सकती है। एल्यूमिनियम फास्फाईड दवा की 3-4 ग्राम मात्रा प्रति जिन्दा बिल में डालकर बिल बन्द कर देने से उससे निकलने वाली गैस से चूहे मर जाते है। चूहा नियंत्रण अभियान का क्रियान्वयन चूहा नियंत्रण कार्यक्रम अभियान के रूप में चलाया जायेगा जिसमें स्वयं सेवी संगठनों स्वयं सहायता समूहों किसान क्लबों, कृषि तकनीकी प्रबन्ध अभिकरण (आत्मा ) बीज / उर्वरक / रसायन विक्रेता इफकों सहकारिता का सहयोग प्राप्त किया जायेगा । विभागीय योजनान्तर्गत अनुमन्य 50 प्रतिशत अनुदान पर मूषकनाशी रसायनों को कृषकों को उपलब्ध कराया जायेगा । 19 अक्टूबर से 17 नवंबर तक के मध्य चूहा नियंत्रण के विषय में परिचर्चा के माध्यम से जनपद / तहसील / ब्लाक ग्राम पंचायत स्तर पर चूहा नियंत्रण अपनाने के लिये जन सामान्य को प्रोत्साहित किया जायेगा।
चूहा नियंत्रण के सम्बन्ध में उन्होंने बताया है कि स्थानीय ग्रामवासियों की सहभागिता से चूहा लोगो को जागरूक किया जायेगा। नियंत्रण सम्बन्धित नारों की राईटिंग कराकर भी इस अभियान के क्रियान्वयन में जनसामान्य का सहयोग प्राप्त करते हुए जनसहभागिता सुनिश्चित करने पर विशेष बल दिया जायेगा मच्छर प्रतिरोधी पौधे ज०ई० रोग के विषाणु के वाहक मच्छरों को कुछ विशेष पौधों को लगाकर नियंत्रण किया जा सकता है जैसे गेंदा, गुलदाउदी, सिट्रोनेला, रोज मैरी, तुलसी, लेवेन्डर, जिरैनियम ये पौधे तीव्र गन्ध वाले एसेन्शियल आयल अवमुक्त करते हैं जिनसे मच्छर दूर भाग जाते है इस प्रकार इन फूल पौधों को घरों के आस पास लगाने से वातावरण तो सुगंन्धित होता ही है साथ ही खतरनाक मच्छरों से भी बचाव होता है । इनमें से कुछ प्रजातियों द्वारा तो ऐसे रासायनिक तत्व मुक्त किये जाते है जो मच्छरों की प्रजनन क्षमता ही समाप्त कर देते हैं। इस प्रकार इन पौधो के रोपड द्वारा भी मच्छरों को दूर कर जे०ई० / ए०ई०एस रोग से बचाव किया जा सकता हैं






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