पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एक हालिया फैसले के बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) और बैलेट पेपर को लेकर बहस फिर तेज हो गई है। अदालत ने पंजाब के निकाय चुनावों में बैलेट पेपर से मतदान कराने के राज्य चुनाव आयोग के निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। इसके बाद यह चर्चा शुरू हो गई कि क्या भविष्य में फिर से बैलेट पेपर का उपयोग बढ़ सकता है।
दरअसल, कुछ याचिकाकर्ताओं ने अदालत में जनहित याचिका दाखिल कर मांग की थी कि निकाय चुनाव केवल ईवीएम के माध्यम से कराए जाएं। उनका तर्क था कि ईवीएम से मतदान प्रक्रिया अधिक पारदर्शी, तेज और निष्पक्ष होती है। वहीं राज्य चुनाव आयोग ने अदालत को बताया कि परिस्थितियों और प्रशासनिक आवश्यकताओं को देखते हुए बैलेट पेपर से चुनाव कराने का निर्णय लिया गया है।
मामले की सुनवाई करते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि वर्तमान कानून में बैलेट पेपर और बैलेट बॉक्स का विकल्प अभी भी मौजूद है। अदालत ने यह भी माना कि कई बार स्थानीय परिस्थितियों, संसाधनों की उपलब्धता, साक्षरता स्तर तथा अन्य व्यावहारिक कारणों के चलते चुनाव प्राधिकरण बैलेट पेपर का उपयोग करने का फैसला कर सकते हैं। अदालत के अनुसार कानून ईवीएम के उपयोग को अनिवार्य नहीं बनाता और जरूरत पड़ने पर पारंपरिक मतदान प्रणाली अपनाई जा सकती है।
हाईकोर्ट ने याचिकाओं को खारिज करते हुए यह भी कहा कि चुनाव कार्यक्रम पहले ही काफी आगे बढ़ चुका था और ऐसे समय में मतदान प्रक्रिया में बदलाव उचित नहीं होगा। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को चुनाव परिणाम के बाद कानूनी उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी।
इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने भी हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर चुनाव प्रक्रिया में दखल देने का कोई उचित आधार नहीं बनता है।
हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि अदालत ने पूरे देश में ईवीएम से मतदान बंद करने का कोई आदेश नहीं दिया है। फैसला केवल पंजाब के निकाय चुनावों में बैलेट पेपर के उपयोग से संबंधित था। देश में लोकसभा, विधानसभा और अधिकांश अन्य चुनावों में अभी भी ईवीएम का उपयोग जारी है।
इस फैसले ने एक बार फिर चुनावी पारदर्शिता, तकनीक और पारंपरिक मतदान प्रणाली को लेकर बहस को जन्म दिया है। एक पक्ष बैलेट पेपर को अधिक भरोसेमंद मानता है, जबकि दूसरा पक्ष ईवीएम को तेज, सुविधाजनक और आधुनिक व्यवस्था के रूप में देखता है। आने वाले समय में चुनाव सुधारों पर यह बहस और तेज होने की संभावना है।






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