मेरठ।
*कानून बनाम तुगलकी फरमान?* ⚖️
*UP पुलिस की DSP सौम्या अस्थाना के कथित आदेश को लेकर बड़ा सवाल*
*मेरे किसी भी थाने के अंदर अगर पत्रकार ने वीडियोग्राफी की, तो तुरंत मुकदमा दर्ज होगा!
*लेकिन सवाल यह है — क्या ऐसा फरमान कानून से ऊपर है?
*कानूनी हकीकत अनुच्छेद 19(1)(a) – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता Press Freedom का मूल आधार
*पत्रकार कोई अपराधी नहीं — वे सार्वजनिक हित में सूचना संकलन करते हैं, और थाना एक सार्वजनिक स्थान है, कोई निजी परिसर नहीं
*सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के कई फैसले कहते हैं, कि प्रेस को बिना वैध कारण रोका नहीं जा सकता
*बिना कानून बताए सिर्फ “आदेश” देना = मनमानी
*Fir तभी दर्ज हो सकती है जब कानून में स्पष्ट अपराध हो,सवाल सिर्फ पत्रकारों का नहीं है।
*आज कैमरा रोका गया है,कल आवाज़ रोकी जाएगी…
*कानून का राज फरमान से नहीं,संविधान से चलता है।
*पत्रकार का कैमरा अपराध नहीं है,कानून से ऊपर कोई नहीं — न वर्दी, न पद⚖️
*अभिव्यक्ति की आज़ादी संविधान ने दी है, किसी अफ़सर के मौखिक आदेश ने नहीं







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