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मंगलवार, 29 अगस्त 2023

बुंदेलखंड में चुनावी शंखनाद, टीकमगढ़ जिले में सपा बसपा बिगाड़ती चुनावी गणित: टीकमगढ़, जतारा और खरगापुर विधानसभा क्षेत्र में बीजेपी का कब्जा

 


*पानी,पलायन एवं बेरोजगारी प्रमुख समस्या, जातिगत समीकरण पर टिका  विधानसभा चुनाव का समीकरण

*पंकज पाराशर छतरपुर

बुदेलखंड के इस गढ़ में बीजेपी मजबूत स्थिति ठीक है। टीकमगढ़ जिले में 3 विधानसभा सीटें टीकमगढ़, जतारा और खरगापुर आती है। मध्यप्रदेश का बुदेलखंड अंचल सियासी पार्टियों का सबसे बड़ा चुनावी अखाड़ा बन गया है। उत्तर प्रदेश से सटे होने से जिले की राजनीति पर सपा-बसपा का भी असर साफ दिखाई देता है। टीकमगढ़ का सियासी समीकरण जातिगत समीकरण पर टिका हुआ है। यहां ओबीसी और दलित हार जीता का फैसला करते है। पूरे प्रदेश में जब सवर्ण और दलित आंदोलन का प्रभाव पड़ा था, तब टीकमगढ़ बेअसर रहा था। टीकमगढ़ जिले में 3 विधानसभा सीटें टीकमगढ़, जतारा और खरगापुर आती है। तीनों सीटें बीजेपी के खाते में है।

*टीकमगढ़ विधानसभा सीट.....

बुदेलखंड का ये क्षेत्र सूखे की मार से जूझता रहा है। पानी की समस्या यहां की सबसे बड़ी समस्या है। टीकमगढ़ विधानसभा सीट पर अनुसूचित जाति के मतदाताओं की संख्या सबसे अधिक है। इसके अलावा क्षेत्र में यादव, ठाकुर भी निर्णायक भूमिका में होते है। साल 2008 में बीजेपी की फायर ब्रांड नेता उमाभारती ने भाजपा से अलग होकर अपनी अलग पार्टी भारतीय जनशक्ति पार्टी बना ली थी। उमाभारती 2008 में चुनाव लड़ी और अपने ही घर टीकमगढ़ में चुनाव हार गई थी। सीट पर हार जीत का गणित बसपा-सपा पर निर्भर होता है। यहां से 2018 में बीजेपी के राकेश गिरी, 2013 में बीजेपी से के के श्रीवास्तव, 2008 में कांग्रेस के यादवेंद्र सिंह, 2003 में बीजेपी के अखण्ड प्रताप सिंह यादव, 1998 में बीजेपी के मगललाल गोयल, 1993 में कांग्रेस के यादवेंद्र सिंह, 1990 में बीजेपी के गोयल मगनलाल, 1985 में कांग्रेस के यादवेंद्र सिंह, 1980 में कांग्रेस से सरदार सिंह, 1977 में जेएनपी से मगनलाल गोयल यहां से जीते।

*जतारा विधानसभा सीट.....

जतारा विधासनभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। अहिरवार, वंशकार और कुशवाहा समाज के वोट, प्रत्याशी की हार-जीत में अहम भूमिका निभाते हैं। यहां के मुख्य चुनावी मुद्दे बेरोजगारी, सिंचाई और पलायन है। जतारा के चुनाव में सपा -बसपा बीजेपी कांग्रेस को कड़ी टक्कर देती है। जतारा सीट कोबीजेपी का गढ़ माना जाता है। 1990 से लेकर 2018 तक सीट पर सात बार हुए चुनाव में बीजेपी ने पांच बार और दो बार कांग्रेस ने जीत हासिल की है। वर्ष 2018 में बीजेपी के हरिशंकर खटीक, 2013 में कांग्रेस के दिनेश कुमार अहिरवार, 2008 में बीजेपी के हरिशंकर खटीक, 2003 में बीजेपी के सुनील नायक, 1998 में बीजेपी के सुनील नायक, 1993 में कांग्रेस से अखण्ड, 1990 में बीजेपी के सुरेंद्र प्रताप सिंह, 1985 में कांग्रेस से ठाकुर दास यादव, 1980 में निर्दलीय स्वामी प्रसाद पादरी, 1977 में जेएनपी से अखण्ड प्रताप सिंह यहां से चुनाव जीते।

*खरगापुर विधानसभा सीट...

खरगापुर सीट पर बीएसपी चुनावी मुकाबले को त्रिकोणीय बना देती है। सीट पर निर्दलियों के साथ साथ बागीयों के चुनावी मैदान में आने से मुकाबला रोचक हो जाता है। यह निर्वाचन क्षेत्र 1967 में विधान सभा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आया और 1967 से 2008 तक यह अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित था। यहां बीएसपी बीजेपी और कांग्रेस का खेल बिगाड़ देती है। यहां से 2018 में बीजेपी के राहुल लोधी, 2013 में कांग्रेस से चंदा सुरेंद्र सिंह गौर, 2008 में बीजेएसएच से अजय यादव, 2003 में बीजेपी से हरिशंकर खटीक, 1998 में बीजेपी से पर्वतलाल अहिरवार, 1993 में बीजेपी से पर्वतलाल अहिरवार, 1990 में बीजेपी से आनंदीलाल, 1985 में कांग्रेस से वृन्दावन अहिरवार, 1980 में कांग्रेस से नाथू राम अहिरवार, 1977 में जनता पार्टी से नाथू राम अहिरवार, 1972 में कांग्रेस से बैजू अहिरवार चुनाव जीते।

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