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देवरिया । 16 फरवरी। जिला कृषि रक्षा अधिकारी रतन शंकर ओझा ने बताया है कि सामान्यतया पीला रतुआ के प्रकोप हेतु 6 से 18 डिग्री सेन्टीग्रेट तापमान एवं 90 प्रतिशत से अधिक आर्द्रता के साथ-साथ इस जनवरी और फरवरी माह दिखाई देता है। रोग का प्रकोप होने पर पीलेे से नारंगी रंग यूरेडियोस्पोर धारियों के आकार में पत्तियों पर पाउडर में रूप में दिखाई पड़ते है जिसे हाथ लगाने पर हाथो में पीला पाउडर चिपक जाता हैै। यह रोग खेत से 10-15 पौधो पर गोल घेरे रूप में शुरू होकर बाद में पूरे खेत में फैलता है। पीला रतुआ से बचाव हेतु नाइट्रोजनयुक्त उर्वरक का प्रयोग अधिक नहीं करना चाहिए तथा प्रकोप के लक्षण परिलक्षित होने पर प्रोपिकोनाजोल 0.1 प्रतिशत अथवा टेबुकानाजोल 50 प्रतिशत एवं ट्राईफ्लाक्सीस्ट्राबिन 25 प्रतिशत डब्लू0जी 0.06 प्रतिशत का घोल बनाकर 15 दिन के अन्तराल पर छिडकाव करना चाहिए।
करनाल बन्ट बीज एवं भूमि जनित रोग है। इस बीमारी से न तो पौधों की सभी बालियों और न ही बालियों में सभी दाने प्रभावित होते है। इसकी पहचान खेत में नहीं हो पाती और ज्यादातर मामलों में फसलो की कटाई और थ्रेसिंग के बाद ही दिखाई पड़ती है। इसके प्रकोप की दशा में गेहूॅ की बालियों एवं दानो पर काले रंग के पाउडर के रुप में टेलीयोस्पोर चिपके रहतें, जिसका प्रसार हवा द्वारा तेजी से होता है। ठण्डा तापमान, उच्च आद्रता एवं रुक रुक कर होने वाली बारिश रोग के विकास को बढ़ावा देती है। यदि बीते वर्षों में इस रोग का संक्रमण रहा हो और मौसम रोग संक्रमण के अनुकूल हो तो फूल अवस्था के दौरान यथासंम्भव सिचाईं नही करनी चाहिए। गेहूं की पुष्पावस्था में तापमान में गिरावट एवं अधिक आद्रता होने की स्थिति में बालियां निकलते समय प्रोपिकोनाजोल 0.1 प्रतिशत का सुरक्षात्मक छिडकाव करना चाहिए।






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